Bageshwar Baba Dhirendra Shastri Ki Rula Dene Vali Life Story

बागेश्वर धाम (Bageshwar Dham) के संत बागेश्वर बाबा (Bageshwar Baba) के नाम से देश और दुनिया में प्रशिद्ध धीरेंद्र शास्त्री (Dhirendra Shastri) जिनका नाम सायद ही किसीने नहीं सुना होगा, लेकिन उनकी हृदयद्रावक जीवन कहानी के बारे में सायद बहुत कम लोग जानते होंगे. अगर आप बागेश्वर बाबा को मानते है तो यह वास्तविक जीवन कहानी (Real Life Story) सुनकर आपकी आँखों में आंसू आने से आप रोक नहीं पाएंगे.

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Bageshwar Baba Dhirednra Shastri Biography

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बागेश्वर बाबा (Bageshwar Baba) का जन्म:

तो यह कहानी शुरू होती है मध्यप्रदेश के छतरपुर जिल्ले के एक छोटे से गाँव गढ़ा से। 5 जुलाई 1996 के दिन माता सरोज देवी गर्ग और पिता रामकृपाल गर्ग के घर अपने पहले पुत्र का जन्म हुआ। जिसका नाम उन्होंने धीरेंद्र रखा। उन्हें कहाँ पता था की यह बालक एक दिन बड़ा होकर ईश्वर के मार्ग पर इस तरह चलेगा की लोग इसे ही ईश्वर का अवतार मानने लगेंगे।

गढ़ा गाँव में एक बालाजी हनुमान का प्राचीन मंदिर है, जो बागेश्वर बालाजी के नाम से भी जाना जाता हैं। धीरेंद्र के दादाजी यानि की भगवान दास गर्ग चित्रकूट के निर्मोही अखाड़े से दीक्षा लेकर गढ़ा गाँव आ कर बस गए थे और वहाँ के बागेश्वर बालाजी के मंदिर के मुख्य पुजारी का जिम्मा अपने सर उठा लिया था। साथ ही वह गाँव में पंडिताई कर अपने जीवनिका चला रहे थे।

भगवान दास के बेटे यानि की धीरेंद्र जी के पिता रामकृपाल गर्ग नशे की लत में ऐसे चढ़ गए थे की ना उन्हें परिवार दिखता और नहीं भगवान। वह कोई काम नहीं करते थे और बस पुरे दिन नशे कर के ही अपना समय व्यतीत करते थे। धीरेंद्र जी के घर में 6 लोग रहते थे। उनके दादाजी भगवान दास गर्ग, माता-पिता सरोज देवी गर्ग और रामकृपाल गर्ग।

इसके अलावा उनके दो छोटे भाई बहन भी थे जिनका नाम शालिग्राम गर्ग और बहन का नाम रीता देवी गर्ग है। धीरेंद्र जी के छोटे भाई शालिग्राम गर्ग आज भी बागेश्वर बालाजी के धाम से जुड़े है और धीरेंद्र जी के साथ मिलकर प्रभुभक्ति और मानव सेवा के कार्य कर रहे है।

छोटी उम्र से ही धीरेंद्र शास्त्री (dhirendra shastri) को करनी पड़ती थी भिक्षावृति:

धीरेंद्र आठ वर्ष की छोटी सी आयु में ही भिक्षा मांगने जाने लगे। यह उनका पुरोहित धर्म था इसलिए उन्हें कभी संकोच नहीं होता था। घर की स्थिति इतनी ख़राब थी की धीरेंद्र को भिक्षा में मिले अन्न और वस्तु पर ही पूरा घर आधार रखता था। पिताजी कुछ काम नहीं करते थे, दादाजी की उम्र हो चली थी और माता बिचारी करे तो करे क्या? दो छोटे भाई बहनो की जिम्मेदारी भी थी। इन्ही काल के खेलो ने धीरेंद्र को बड़ी ही छोटी सी उम्र में बड़ा बना दिया।

धीरेंद्र जी ने अपना पहली से आठवीं कक्षा तक का प्राथमिक अभ्यास अपने ही गाँव गाढ़ की एक सरकारी स्कूल से पूरा किया। हालात भले ही कितने ही ख़राब क्यों न थे, पर धीरेंद्र ने कभी परिस्थितिओं के साथ समझोता नही किया और ना ही कभी अपनी किस्मत को दोष दे कर पछताते रहे। वह सदैव भगवान बालाजी हनुमान पर विश्वाश करते थे और हमेंशा कहते थे की एक दिन समय जरुर बदले गा और बालाजी हमारी जरूर सुनेगा।

धीरेंद्र कम उम्र में ही ईश्वर की भक्ति में लग गए थे। वह दादाजी भगवान दास के साथ बागेश्वर बालाजी मंदिर जाते, प्रभु की सेवा और पूजा अर्चना करते। धीरेंद्र शास्त्री जी के मुताबिक उनके पहले गुरु उनके दादाजी भगवानदास गर्ग ही थे जिन्होंने धीरेंद्र को पूजा-अर्चना करना सिखाय, अलग अलग पूजा की विधियाँ सिखाय और साथ ही साथ संस्कृत भाषा से भी परिचित करवाया।

धीरेंद्र शास्त्री जी जब महज 12 साल के थे तब ही से वह सत्यनारायण जी की कथा पढ़ना जान गए थे और गाँव के लोगो उन्हें कथा पढ़ने बुलाया करते थे। जिससे उनकी कुछ आमदनी भी हो जाती थी।

धीरेंद्र शास्त्री जी बताते हैं कि वह पांच लोग एक कच्चे से मकान में रहते थे। जब बारिश आती थी तो जानो उनके सर पर कयामत ही आ गिर ती थी। घर में चारो और से पानी टपकने लगता था। यह डर हमेंशा सताता था की कही मकान गिर न जाए। धीरेंद्र अपने भाई शालिग्राम और बहन रीता के साथ डर के मारे खटिए के नीचे घुस जाते थे और तीनो भाई बहन बालाजी को उन्हें और उनके एक मात्र सहारे यानि घर को सही सलामत रखने की प्रार्थना करते थे और साथ ही साथ हनुमान चालीसा का रटन करते थे।

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Bageshwar Baba Photo

बागेश्वर बाबा (Bageshwar Baba) 5 किलोमीटर चल कर जाते थे स्कूल:

धीरेंद्र ने अपनी प्राथमिक पढाई पूरी की और उसके बाद वह अपने पास ही के गाँव के एक सरकारी माध्यमिक स्कूल में दाखिला लेकर पढ़ने जाने लगे। धीरेंद्र के घर से स्कूल तक़रीबन 5 किलोमीटर दूर थी। उनके पास ना ही कोई वाहन था और ना ही इतने पैसा की वह किसी साधन द्वारा स्कूल तक जा सके। यहाँ तक की उनके पास एक साइकल भी नहीं थी।

वह रोज 5 किलोमीटर चल कर जाते थे। चलते चलते वह हमेंशा हनुमान चालीसा गाते रहते और देखते ही देखते उन्हें पता भी नहीं चलता और वह स्कूल पहुंच जाते। शायद यह बालाजी हनुमान की ही कोई लीला थी।

गरीबी इतनी ज्यादा थी की धीरेंद्र के पास पहनने के लिए मात्र एक ही पजामा था। वह पजामा रात को धो कर सूखा देते और फिर वापस उसे सुबह नाह-धो कर पहन स्कुल की और रवाना हो जाते थे। उनके स्कूल के मित्र हमेंशा उन्हें चिढ़ाते थे और कहते थे, “क्यों पंडित दूसरे कपडे नहीं क्या तुम्हारे पास, जो रोज एक ही पजामा पहन आ जाते हो।”

बात तो सच थी पर किसी के आगे अपनी लाचारी गा कर क्या ही होगा यह सोच कर और थोड़ी लज़्ज़ा के भी मारे धीरेंद्र कह देते थे की, “नहीं, नहीं. ऐसा कुछ भी नहीं हैं। जरा ध्यान से तो देखो यह दूसरा पजामा है। वह क्या है ना की मुझे पजामा पहनना बहुत अच्छा लगता है इस लिए हम रोज पजामा ही पहन कर आते है।” 

धीरेंद्र को भी बाकी बच्चो की तरह जीन्स और नए नए शर्ट पहनने का सोख तो बहुत था पर क्या करे? जेब भी तो साथ नहीं देती उनका। जब वह लोगों को तिलक लगाने जाते थे तब लोग उनकी निंदा करते हुए कहते थे, “क्यों रे? बड़ा पंडित बनेगा, पहले अपने फ़टे हुए कपडों को तो सिले जरा।” ऐसी बाते सुन धीरेंद्र की मानो रूह ही काँप जाती थी, पर सुनने और सहने के अलावा उनके पास और विकल्प भी क्या था?

लोगों की निंदा के बिच माँ के प्यार ने, घर की जिम्मेदारियों ने और अपने दीनानाथ बालाजी हनुमान की भक्ति ने ही उन्हें संभाल रखा था। धीरेंद्र जानते थे की ईश्वर उनकी परीक्षा ले रहा है और उन्हें इस परीक्षा में प्रथम आना हैं। ऐसी तो मानो कई ओर कठनाईया भी थी जिन्होंने धीरेंद्र के बचपन को मानो बिना चंद्रमा वाली काली अमावस की रात बना दिया हो।

कुदरत बराबर से उनकी परीक्षा ले रही थी, परन्तु धीरेंद्र का आत्मविश्वास और बालाजी हनुमान पर का भरोसा कभी डगमगाया नहीं। लोगों की निंदा और मुसीबतो के बिच वह हमेशा बालाजी पर श्रद्धा रखते थे। उनकी माता जी यानि सरोज देवी की कही बात उनके धैर्य को और हिंमत को और बढ़ा देती थी जो बात थी,  “धैर्य और बालाजी पर भरोसा रख एक दिन समय जरूर बदलेगा।”

धीरेंद्र शास्त्री (Dhirendra Shastri) को माँ की लाचारी देख बचपन में करनी पड़ी मजदूरी:

धीरेंद्र जब अपने स्कूल में थे तब उन्हें समझ आ गया था की वह दूसरे बचो की तरफ इतनी आसानी से पढाई नहीं कर पाएंगे। उन्हें खुद भी पढ़ने का बहुत शौक था और उनकी माता सरोज देवी भी धीरेंद्र को पढ़ाना चाहती थी। धीरेंद्र जानते थे की घर के हालत तो शुरूआत से ही ठीक नहीं। अब उन्हें कुछ आमदनी भी कमानी पड़ेगी।

सत्यनाराण की कथा सुनकर और दूसरे किसी छोटे मोटे पूजा पाठ से घर के लिए जरुरी आमदनी तो नहीं आ पायेगी, पर करे तो करे क्या? पढाई के प्रति लगाव और माँ के सपनो के खातिर पढाई भी तो नहीं छोड़ सकते और वह ही अब घर के बड़े है, इसलिए घर की स्थिति को अनदेखा करना तो बिलकुल सही नहीं होगा।

धीरेंद्र शास्त्री (Dhirendra Shastri) को आठ साल की उम्र में करना पड़ा काम:

धीरेंद्र एक सेठ के पास गए और काम माँगा। उन्हें काम मिल भी गया, क्योंकी वह पढाई लिखाई में तो तेज़ थे ही। अब काम क्या करना था की उन्हें पुरे दिन में कितने ट्रेक्टर आये कितने गए, कितने डीज़ल का उपयोग हुआ, ऐसे कुछ छोटे मोटे हिसाब उन्हें रखने थे। इस काम के बदले उन्हें प्रतिदिन एक रूपया मिलता।

धीरेंद्र यह बात बहुत अच्छे से जानते थे की अगर घर में किसी को पता चला तो उन्हें दुःख होगा की छोटे से धीरेंद्र को काम करना पड़ रहा है। शायद माँ मातृप्रेम वश धीरेंद्र को नौकरी ही न करने दे। भले ही घर की स्थिति कितनी भी ख़राब क्यों न हो। माँ तो नहीं मानेगी।  

धीरेंद्र ने यही सोच किसी को कुछ नहीं बताया। अब धीरेंद्र घर से बक्शा ले कर तो यही कहते थे की सीधा स्कुल जाऊंगा, पर वह जाते नही थे और सीधा काम पर चले जाते थे। काम से घर आने में शाम हो जाती थी। माँ रोज धीरेंद्र को पूछती की कहाँ था? अब तक धीरेंद्र जवाब देते थे की, “माँ स्कूल से सीधा खेलने चले गए थे।”  जब की वह ना ही स्कूल जाते और ना ही खेलने। बस पर अपनी माँ का दिल रखे ने लिए जुठ बोल देते।

धीरेंद्र प्रतिदिन जैसे ही उनको पैसे मिलते वैसे ही वह घर पर आ कर माँ को दे देते। माँ रोज पूछती की यह एक रूपया कहाँ से आया? और धीरेंद्र जवाब देते की, “आज किसी भले आदमी ने मुझसे कुछ पूछा और मैंने बालाजी का नाम लेकर बता दिया, तो उस भले आदमी ने मुझे पैसे दिए।”

माँ की आंखे हर बार जुठ पकड़ लेती थी, पर एक मुसीबत से घिरी लाचार स्त्री करे तो करे क्यां? वह धीरेंद्र को कुछ नहीं बोल पाती थी। धीरेंद्र तो बिचारा खुद अभिमन्यु के जैसे समय के चक्रव्यूह में फ़सा था। वह भी कुछ ज्यादा न बोलता था।

धीरेंद्र और उनका परिवार सिर्फ पार्लेजी खाकर बिताते थे हफ्ते:

धीरेंद्र शास्त्री (Dhirendra Shastri) जी ने कुछ इनसे भी ज्यादा ख़राब दिन देखे है अपने जीवन में। धीरेंद्र बताते है की कई बार ऐसा होता था की कुछ खाने पीने को नहीं होता था। फिर कही से कोई उपाय कर यानि की कोई पूजा और कथा कर जो 1-2 रुपए आते थे उनसे आटा लाना तो संभव नहीं था।

वह एक चाय पत्ती की पुड़िया और पार्लेजी बिस्कुट ले आते थे। माँ चाय बनाती थी और उसके साथ सब एक दो एक दो बिस्कुट खा कर पूरा दिन निकाल देते थे। कभी कबार तो हफ्तों तक आटा लाने के पैसे नहीं होते थे और सिर्फ चाय और थोड़े बहुत बिस्कुट खा कर ही अपना दिन गुजारना पड़ता था। इस तरह की दयनीय स्थिति थी धीरेंद्र और उनके परिवार की!

त्योहारों होते थे बागेश्वर बाबा (Bageshwar Baba) के लिए दुःख के दिन:

त्योहार जो लोगो के जीवन में खुशियाँ लाती है, पर धीरेंद्र के लिए ऐसा नहीं था। उनके परिवार की स्थिति त्योहारों में तो और दयनीय हो जाती थी। त्यौहार आते ही लोग एक तरफ मिठाईया खरीदते, नए कपडे खरीदते, फटाके खरीदते और खूब आनंद बनाते तो दूसरी तरह धीरेंद्र के घर में खाने के लिए अन भी न होता, पहनने को वही पुराने फ़टे कपडे और छोटे भाई बहन जो छोटे थे और घर की स्थिति समज पाने योग्य न थे। उनकी दूसरे बच्चों को देख नए कपडे और फटाके लेने के लिए जिद मानो गरीबी उनकी गरीबी का मजाक बना रहा हो।

धीरेंद्र शास्त्री बताते हैं की वह जब छोटे थे तब दिवाली की रात उन्हें भी फटाके फोड़ने की बहुत इच्छा होती थी, पर वह यह भी जानते थे की माँ फटाके नहीं खरीद पायेगी, इस लिए वह कभी बताते नहीं थे। धीरेंद्र दिवाली के बाद नए वर्ष की सुबह सबसे जल्दी उठ पुरे गाँव के कचरो के ढेर को तलाशते थे की काश कोई गिरा हुआ या बिन फूटा फटाका मिल जाये और वह उसे फोड़ कर खुशियाँ मना सके।

करीबन पचासो ढेर कचरे के ढूंढने के बाद जब उन्हें कोई बिना फूटा फटका मिलता था, तो वो ख़ुशी के मारे जूम उठते थे और सीधा दौड़ घर जा कर फटाका माँ को दिखते थे और कहते थे की, “देखो माँ, देखो मुझे फटाका मिला!” और बेटे की यह ख़ुशी देख उस गरीब माँ की आंखे भी जानो अमृत के जैसे छलक उठती थी।

बागेश्वर बाबा (Bageshwar Baba) का अपमान और उनकी ज़िद: 

ऐसा ही बागेश्वर बाबा (Bageshwar Baba) के जीवन से जुड़ा और एक घटना है, जो उनकी ज़िद और सहनशक्ति को दर्शाता है। जब वह महज 10-12 साल के थे तब उनके एक पडोसी टीवी ले आये थे। गाँव का वह पहला टीवी था और हर कोई उसे देखने के लिए उनके घर जाता था। धीरेंद्र भी थे तो आखिर नादान बालक ही। वह भी जिग्नासा वश पहुंच जाते थे टीवी देखने।   

अब समय तो वैसे ही धीरेंद्र का ख़राब चल रहा था। एक रात 10 बजे के आसपास का समय था और धीरेंद्र अपने पडोसी के घर में बैठे बैठे टीवी देख रहे थे। तभी पडोसी ने अपनी माँ से कहा, “जब देखो तब मुँह उठा कर आ जाता है टीवी देखने।” धीरेंद्र समज गए, यह बात उनको कही गई है। इन शब्दों ने तो मानो धीरेंद्र के दिल लहूलुहान ही कर दिया। वह उठ खड़े हुए उनके अश्रु भी बस अब गिरने को ही थे  पर उन्होंने बागेश्वर बालजी का नाम लिया, मुस्कान और बड़े विवेक से पडोसी को कहा, “रामराम, अब हम चलते है जी।” पडोसी ने रामराम का भी जवाब नहीं दिया।  

धीरेंद्र घर को आये। माँ धीरेंद्र के चहेरे पर बने धिकार, उदासी और लाचारी के भाव को पहचान गई और पूछा की क्या हुआ? धीरेंद्र के आँशु बड़े वफादार थे। उनको बहार आना तो था, पर धीरेंद्र ने उसे रोककर रखा था। एक बड़ी सी मुस्कान के साथ धीरेंद्र ने माँ को जवाब दिया, “वह तो क्या है ना लाइट चली गई तो मैं वापस आ गया।” उस वक्त धीरेंद्र शास्त्री जी की झोपड़ी में लाइट भी न थी वह बस एक लालटेन से गुजरा करते थे।

पडोसी द्वारा बोले गए शब्द अब बार बार धीरेंद्र के मस्तिष्क में आने लगे। उनका घर गाँव के सबसे आखिर छोर पर था। मकान के बाजु में कुछ खाली जमीने पड़ी थी, धीरेंद्र वहा जा कर बैठ गए।  एकलता देख कब से आँखों में रोक रखी गंगा-जमना को उन्होंने बहार आने की इज़ाज़त दे दी। करीबन एक-डेढ़ घंटे तक वह वही बैठे बैठे रोते रहे। अपमान तो अब बहुत बड़ा हो चूका था उनका और परिस्थिति भी ऐसी थी की कुछ कह भी नहीं सकते।

उस रात धीरेंद्र ने प्रण लिया की जब तक वह अपने पैसो का अपना एक टीवी नहीं खरीद लेते वे तब तक टीवी नहीं देखेगे। अब पडोसी के घर जाना तो मानो धीरेंद्र ने बंध ही कर दिया, पर इसके उपरांत वह जहाँ कही पूजा कथा कराने जाते और उन्हें बिठाया जाता तब सबसे पहले वह यह देखते की कही उस कमरे में टीवी तो नहीं है ना?! अगर जो टीवी होता तो वह बहार धुप में बैठ जाते पर टीवी के सामने नहीं बैठते, क्योंकि जब तक अपना टीवी न ले ले तब तक टीवी न देखने का प्रण जो लिया था!

जब धीरेंद्र को बस में भी बैठना हो तो वह पहले यह देखते थे की कही बस में टीवी तो नहीं लगी और अगर जो लगी हो तो उसी वक्त बस से उतर जाते थे। एक बार तो ऐसी परेशानी आई की रात बहुत हो गई थी और घर पहुंचने के लिए बस में बैठना बहुत जरुरी था, पर बस में टीवी लगा हुआ था। धीरेंद्र बस में बैठ तो गए, लेकिन पुरे सफर के दौरान उन्होंने एक भी बार नज़र उठाकर टीवी की ओर नहीं देखा। पुरे रस्ते वो प्रभि स्मरण में लीन रहे।

कुछ समय बाद वह डेढ़ हजार रुपए दे कर एक पुराना ब्लैक एंड वाइट टीवी खरीद लाये। गाँव वालो ने उनकी बहुत ठेकड़ी उड़ाई और कहाँ, “पंडित पागल तो नहीं हो गया ना? घर में खाने को धान नहीं और नवाब साहब टीवी ले आये।” धीरेंद्र ने किसी की बाते कान न धरी। उसने टीवी के तार लगाए और टीवी चालू किया।

आस पड़ोस के लोग सब धीरेंद्र के घर आ गए नया टीवी है यह सोच कर देखने। संजोग वश ऐसा हुआ की जिस पडोसी ने धीरेंद्र का अपमान किया था उसके घर की टीवी ही बिगड़ गई। वह भी धीरेंद्र के घर आया और कहा, “प्रभु आप को टीवी लेने की क्या जरूरत थी? हमारे पास तो है, वहाँ आ कर देख लेते।”

धीरेंद्र मुस्कुराये और बस इतना सा जवान दिया की, “धन्यवाद।” पडोसी बिचारा कुछ समज नहीं पाया और पूछा, “क्या मतलब?” धीरेंद्र ने बस 50 ग्राम बूंदी खरीदी थी और विशेष रूप से सिर्फ इसी के लिए बचा कर रखी थी। शास्त्री जीने बिना किसी जवाब दिए बूंदी उस पड़ोसी को दे दी। मन ही मन मुस्कुरा के बोले की “धन्य हे तेरे अपमान का, अगर उस रात तू मेरा अपमान न करता तो में कभी भी यह टीवी खरीद नहीं पाता।” 

धीरेंद्र शास्त्री जी भले ही आज लाखो लोगों को खाना खिला रहे हो, पर उनकी जिंदगी में ऐसा भी वक्त आया ही की जब उसने और उनके परिवार ने तीन तीन दिन बस पार्लेजी बिस्कुट खा कर दिन गुजारे हो। इतनी गरीबी और दरिद्रता थी की गेहूँ भी मिलना मुश्किल हो गया था। चावल पीसते और उसी की रोटी बनाकर माँ सरोज देवी सबको खिलाती।

धीरेंद्र शास्त्री (Dhiredra Shastri) की गरीबी देख किसी ने नहीं दिया उधार:

जब बागेश्वर बाबा (Bageshwar Baba) 9 साल के थे तब उन्हें वृंदावन जाना था। भागवत का वाचन सिखने के लिए। इसके लिए उन्हें दो हजार रुपियो की जरूरत थी। उन्होंने अपने जान पहचान वालों से गाँव वालो से करीबन पचासो जगह से वह पैसे उधार मांगने को गए पर उन्हें कोई उधार मिला नहीं।

वह सबको बड़ी विनंती करते और कहते, “जब में वृंदावन से भागवत पाठ सिखकर वापस आ जाऊंगा सबसे पहले आपकी उधारी चूका दूंगा या मैं आपके लिए भागवत पढ़ दूंगा और भागवत कथा से जो भी पैसे आएंगे उनसे आपकी एक एक पाई चूका दूंगा, पर कृपया मुझे अभी जाने के लिए पैसे दे दे।” इतनी ही बात के बाद उनकी आँखों में आंसू आ जाते थे और सोच ते थे की ईश्वर के ही काम के लिए मुझे पैसे नहीं मिल रहे! क्या भगवन नहीं चाहते की में उनके उपदेशो को लोगों में फैलाव!

धीरेंद्र को न ही किसी ने पैसे दिए वृंदावन जाने के लिए, उपरांत उनका बुरी तरह से अपमान भी हुआ। कुछ लोगो ने तो यह भी कहाँ ही बड़े भगवान भगवान करते हो तो उन्ही से मांग लो पैसे। धीरेंद्र अब कुदरत की सचाई को जान गए थे। उन्हें अब यह समज आ गया था की यहाँ कोई किसी का नहीं। बस सब धन और लालसा के भोगी है। पर उन्होंने न तो कभी बालाजी हनुमान के प्रति अपनी भक्ति और प्रेम कम होने दिया और ना ही कभी उन लोगों को कुछ कहाँ जिन्होंने उनका कदम कदम पर अपमान किया था।

धीरेंद्र शास्त्री आज भले ही इतने लोकप्रिय हो गए हो, उनके पास भले ही आज सारी सुख सुविधायें मौजूद हो, पर इस बात से कोई मुँह नहीं मोड़ सकता की धीरेंद्र ने अपने जीवन काल में बहुत सी मुसीबतो का सामना किया हे। यह मुसीबते मानो किसी तपती भट्ठी की सामान है जिससे निकलने के बाद धीरेंद्र ओर भी ज्यादा सोने की तरह चमक उठे।

बागेश्वर बाबा (Bageshwar Baba) की बहन की शादी और लाचारी:

जैसे की हमने बात बताई की धीरेंद्र जी की एक छोटी बहन भी है। जिसका नाम रीता गर्ग है। बात उस समय की है जब धीरेंद्र और उनके परिवार को उनकी बहन रीता का विवाह करना था। चलो अब विवहा तो तै हो गया, पर अभी भी घर के हालत इतने अच्छे नहीं थे की सामन्य तरीके से भी रीता का विवाह करवा पाए। पैसो की अभी भी कमी थी।

धीरेंद्र और उनके परिवार ने अपनी पहचान के हर किसी के पास से रीता की शादी के लिए पैसे मांगे, पर लोग जानते थे ना की धीरेंद्र गरीब है. क्या पता पैसे चूका भी पाय या नहीं। यह सोच किसी ने धीरेंद्र की कोई मदद नहीं की।

एक पल के लिए तो मानो भाई धीरेंद्र टूट ही गया। एक तरफ बहन की शादी करीब आ रही थी। बहन को खाली हाथ भी तो नहीं भेज सकते वरना उसके सरुराल में क्या ही इज़्जत रह जायेगी। ऐसी बाते धीरेंद्र को अंदर ही अंदर से खाने लगी। लाचारी इतनी थी की कोई सहारा भी नहीं दे रहा था। पर कहते है न जिसका कोई नहीं उसका भगवान होता है। धीरेंद्र के एक दोस्त थे जिनका नाम था शेख मुबारक। थे तो वह मुसलमान, पर अपने दोस्त धीरेंद्र की पीड़ा को बड़ी भली भांति समझते थे।

जिस वक्त धीरेंद्र को लगा की बहन रीता के विवाह के मानो सारे रास्ते बंध हो गए है। खुशियों के दीपक पर गमो का अँधेरा हावी होने लगा था। जब सब ने आशा मानो छोड़ ही दी थी तब प्रत्यक्ष भगवान के स्वरूप में शेख मुबारक आये थे। धीरेंद्र ने बस एक ही बार अपना दुःख उनसे कहा और मदद मांगी। शेख मुबारक ने बिना एक पल भी सोचे 20 हजार रुपए धीरेंद्र के हाथ में रख दिए और अपनी दोस्ती का प्रमाण दे दिया।

उस वक्त धीरेंद्र शास्त्री जी एक भाई की लाचारी को समजा। गरीब माँ बाप की बेटियों के दुःख को समजा और तै किया की जिस दिन उन्हें बागेश्वर बालाजी किसी की मदद करने के लिए सामर्थ्य देंगे तो पहले वह उन गरीब बहन बेटियों की मदद करेंगे जिनकी गरीबी उन्हें एक सामान्य विवाह करने का भी अवसर नहीं देती। धीरेंद्र ने निश्चय कर लिया की जो लाचारी उन्हें सहनी पड़ी बहन की शादी के वक्त वो अगर बालाजी की कृपा रही तो वह लाचारी वो किसी और को नहीं देखने देंगे।

बागेश्वर बाबा (Bageshwar Baba) की वर्तमान life style:

आज प्रतिवर्ष महाशिवरात्री के दिन बागेश्वर बालाजी धाम में सामूहिक विवाह का आयोजन होता है। जिसमे प्रतिवर्ष सो से भी ज्यादा ऐसी कन्याए जिनके भाई नहीं उनके विवाह का सारा खर्च तो बागेश्वर धाम सरकार धीरेंद्र शास्त्री जी उठाते ही है पर इसके अलावा कई और जरुरी घर उपयोगी चीज़े जैसे की पलग,  तिजोरी, कूलर, पंखा, बर्तन और यहाँ तक की सोने और चाँदी के गहने तक बागेश्वर बाबा दाताओ के सहयोग से तोफे में देते है। जिसका बस एक ही उदेश्य है की जिस तरह के लाचारी और पीड़ा से वह और उनका परिवार गुजरा, वैसी पीड़ा से और कोई ओर गरीब माँ बाप और बेटी न गुजरे।

धरेंद्र जी के पहले गुरु तो उनके दादाजी ही थे जिन्होंने उन्हें बालाजी की भक्ति और उन पर विश्वास करना सिखाया। धीरेंद्र ने गुरु दीक्षा जिन से ली वह और कोई नहीं पर वर्ष 2015 में पद्मविभूषण से सम्मानित किये गए जगद्गुरु रामभद्राचार्य है। जिन्होंने एक छोटे से पौधे समान धीरेंद्र को एक ऐसा गाढ़ बरगद का वृक्ष बना दिया जो आज हजारो लोगों को छाँव दे रहा है। धीरेंद्र से बागेश्वर धाम सरकार धीरेंद्र कृष्णा शास्त्री बनने में जिसका बालाजी के बाद सबसे बड़ा हाथ है वह जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी का है।

आज धीरेंद्र एक कथा वाचक और सनातन धर्म के प्रचारक है। आज बागेश्वर धाम भी उनकी मेहनत और बालाजी हनुमान के आशीर्वाद के बदौलत देश और दुनिया में बहुत ज्यादा मशहूर हो गया है। आज चौबीस घंटे बागेश्वर धाम में भंडारा चलता है। धीरेंद्र शास्त्री जी का कहना है की जिस तरह उन्हों ने भूख को सहा है वैसे किसी और को न सहना पड़े।

इस पीड़ा और दुखों से कोई और नहीं गुजरना चाहिए। इसलिए वह दाताओ और दान पेटी में आये पैसो से चोइसो घंटे भंडारा चलाते है। कई बार उन्हें उधार भी लेना पड़ता है भंडारे को खुला रखने के लिए, पर उन पर अब ऐसे बालाजी प्रभु के आशीष है की कुछ न कुछ तो इंतज़ाम तो प्रभु करवा ही देते है।

आज लोग बागेश्वर बालाजी धाम अपने दुःख और पीड़ा ले कर जाते है। धीरेंद्र शास्त्री जी अपना दरबार भरते है जो लोग उनके पास आते है, उनकी परेशानिया धीरेंद्र भक्तो के बिना कहे ही एक कागज पर लिख देते है। जो की सो फीसद सही भी होती है। फिर बागेश्वर बाबा धीरेंद्र कृष्णा शास्त्री भक्तो को समस्या का निवारण भी बताते है। भक्त बताते है की धीरेंद्र जी से मिलने के बाद और उनके कहे गए सुजाओ को मानने के बाद मानो जीवन ही पूरा बदल गया। यहां तक की भक्त तो बागेश्वर बाबा को बालाजी हनुमान का अवतार भी मानते है।

बागेश्वर बाबा धीरेंद्र शास्त्री ने ईश्वर का अवतार होने वाली बातो को बिलकुल ही ठुकरा दिया है। धीरेंद्र जी का कहना है की यह तो सब वह सिद्धिया है जो उन्हें उनके गुरु जी और बालाजी प्रभु के आशीर्वाद से मिली है। बहुत सारे लोगो ने कोशिश की बागेश्वर बाबा को जूठा साबित करने की, पर कोई भी उन्हें जूठा सिद्ध नहीं कर पाया। सबने उनके चमत्कार के आगे घुटने टेक ही दिए।

धीरेंद्र आज बागेश्वर बालाजी मंदिर के गादीपति है। उनके छोटे भाई शालिग्राम भी उन्ही के साथ जुड़े है और माता पिता रामकृपाल गर्ग और सरोज देवी गर्ग उन्हीं के साथ रह कर बालाजी प्रभु की भक्ति में सहायता करते है। धीरेंद्र शास्त्री जी ने अभी शादी नहीं की पर वह शादी करने का विचार रखते है।

तो यह थी अंधेरो से उठ लोगो को ईश्वर के प्रकाश की और ले जाने वाले बागेश्वर धाम सरकार बागेश्वर बाबा धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की जीवनी। उम्मीद है यह आपको प्रेरणा देगी और सिखाएगी की भगवान नाम की नाँव में बैठ कर चाहे कितना भी गहरा और लम्बा दुखो का समंदर क्यों न हो, पार किया जा सकता हैं। तो बोलो बालाजी प्रभु की जय।

आपने यह Bageshwar Baba Dhirendra Shastri Biography दिलचस्पी से पढ़ी इसका मतलब है की आपको ऐसी इंस्पिरेशनल रियल लाइफ स्टोरी (Inspirational Real Life Story) पढ़नी बहुत अच्छी लगती है। ऐसी ही हमारी ओर पुरानी वास्तविक प्रेरणादायक कहानी भी आपको पसंद आएगी, जैसे की बचपन से अंधा लड़का (Srikanth Bolla) की प्रेरणादायक कहानी और Deepa Arthrey Inspirational Short Story about life।

Who is Bageshwar Baba?

Bageshwar Baba is head of Bageshwar Balaji Dham situated in MP.

What is real name of Bageshwar Baba?

Bageshwar Baba’s real name is Dhirendra Krishna Shastri.

Where is Bageshwar Balaji Dham located?

Bageshwar Balaji Dham located in Garha village, in Chhatrpur district, Madhya Pradesh (MP).

How year old Bageshwar baba is?

Bageshwar Baba’s age is 27 years on 2023.

Bageshwar Baba is married?

No, Bageshwar baba is unmarried now.

What is the net worth of Bageshwar Baba?

Net worth of Bageshwar Baba is 19.50 crores INR.

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